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शनिवार, 13 जून 2020

कृष्णमूर्ति जीवनी, Krishnamurti biography, What is the mind? | J. Krishnamurti


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                       कृष्णमूर्ति जीवनी, Krishnamurti biography

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जिद्दू कृष्णमूर्ति का जन्म 11 मई 1895 को हुआ था ।  उनका जन्म चेन्नई के पास एक छोटे से गाँव , मदंपल्ली में हुआ था ।  वह अपने परिवार में आठवें संतान थें । और उनका जन्म रात को 12:30 बजे हुआ था । इसलिए उनके परिवार में सब उन्हें कृष्णा कहने लगे, जैसा कि भगवन कृष्ण भी आठवीं संतान थे । वे ब्राह्मण थे । उनके पिताजी संस्कृत के एक विद्वान् थे ।  उनके पिताजी का नाम जिद्दू नरिअनिअह था ।  उनके पिताजी सरकारी रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लर्क थे । उनका परिवार एक माध्यम वर्गीय ब्राह्मीन  था ।
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कृष्णमूर्ति की माता का नाम जिद्दू संजीवम्मा था । उनकी आवाज बहुत ही मधुर थी ।  संजीवम्मा ने कृष्णमूर्ती का जन्म अपने ही घर के एक छोटे से पूजा घर में दिया था । यद्यपि यह कोई रिवाज नहीं था, लेकिन संजीवाम्मा ने जिद किया की वह ये बच्चे का जन्म केवल पूजा के कमरे में ही देंगी । इसलिए कृष्णमूर्ति का जन्म  घर के एक छोटे से,पूजा गृह या कहे  मंदिर में हुआ था । उनका जन्म रात के 12:30 बजे हुआ था, और वे आठवें बच्चे थे, तो परिवार में सभी ने मिलकर  कृष्णमूर्ति नाम दे दिया.
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उनकी जन्म कुंडली बहुत ही बढ़िया और आश्चर्यजनक थी । वह छः साल की उम्र तक स्कूल जाने लगे थे ।  सात साल की उम्र में उनका पवित्र जनोई रस्म हुआ । भारत में इसे उपनयन कहा जाता है । इस रस्म का मतलब है कि वह अभी द्वीज हुए , यानि उनका दूसरा जन्म हुआ । अभी वह सच में ब्राह्मण हुए ।
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क्रिश्ना का दीमाग मिकेनिकल था, उनको छोटी छोटी चीज रीपैर करने में बहोत मजा आता था ।  उनको घर पर घड़ी की मरम्मत करना , और कांडा घडी को रीपैर बहुत अच्छा लगता था ।
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क्रिश्ना को स्कूल जाना पसंद नहीं था ।  वह पढाई में कमजोर थे । वह दीन भर चूप चाप   देखा करते थे । कभी-कभी देखने में लोगो और उनके शिक्षक को  लगता था की उनका दिमाग कमजोर है, पर वह एक बहुत अच्छा निरिक्षण करने वाले थे । उनको सूर्योदय और सूर्यास्त देखना बहुत अच्छा लगता था । उनको छोटे छोटे पौधे और तितली बहोत प्रिय थे ।
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क्रीष्णमूर्ति जब छोटे थे तभी उनकी बडी बहेन  का 20 वर्ष की आयु में मृत्यु हुआ, तभी  उनको बहुत गहरा झटका लगा । यह उनके जीवन की चेतना के बदलाहट का क्षण था । पहली बार उनको अनुभव हुआ कि मृत्यु रोका नहीं जा सकता है ।  मृत्यु सबके लिए निश्चीत है. एक दिन सभी को मरना है । इसी समय उसको सबसे पहेले थोडा अनिश्चित जीवन  का अनुभव हुआ । वह अपनी बहन के बहुत प्रेम करते थे, और उनकी बहन बहुत पवित्र और भावनात्मक  थीं ।  इस प्रसंग के बाद कृष्णमुर्ती स्वास्थ से बहुत कमजोर हो गए । वह ह्रदय से इतने शुद्ध थे कि मृत्यु के बाद भी वह  अपनी बहन का सूक्ष्म शरीर को  देख सकते थे । उन्हो ने लिखा है कि, उनकी बहेन का शुक्ष्म शरीर उनके घर के पीछे जो छोटा सा बगीचा है , वहां आता था , और वहां उनको , उसकी भेट होती थी ।
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क्रीष्णमूर्ति ने लिखा है कि उनकी बहन का सूक्ष्म शरीर , मृत्यु के बाद उनके घर के बगीचे में एक निश्चित स्थान पर आया करता था ।  ठीक दो साल के बाद उनकी मां का भी निधन हुआ ।  अभी कृष्णमुर्ती को  उनकी माँ , और बहेन दोनों के शुक्ष्म शरीर का अनुभव होता था । कृष्णमूर्ति, को माँ और बहेन दोनो  का सूक्ष्म शरीर  दीखता था । उनको यह भी याद था कि उनकी मां का शुक्ष्म शरीर  , जब वह स्कूल जाया करते थे, तो उनके पीछे-पीछे आया करता था । उन्हें  माँ कि  चूड़ियों की खनक का आवाज  सूनाई पडती थी   । उनके पिताजी ने भी इस बात की पुष्टि की है, कि  क्रिश्ना अपनी माँ और बहेन  के सुक्ष्म शरीर को देख सकने में समर्थ थे....
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 कृष्णमूर्ति का पोषण अच्छा नहीं था और उनका स्वास्थ्य भी नरम रहता था...
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नरिअनिअह, कृष्णमूर्ति के पिताजी थियोसोफिकल सोसाइटी के सामान्य   सदस्य थे । डा. एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसाइटी की चेयरमैन थीं । वह उन कुछ अंग्रेज लोगों में से थीं, जो भारत से , और भारत के लोगो से प्रेम करती थी । और भारतीयों को शिक्षा देकर उनका सामाजीक स्थर ऊपर उठाने के लिए बहुत काम करते थी ।
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यह वह समय,था जब विश्व पर दुसरा  विश्व युद्ध चल रहा था ।  सभी लोग इस कोलाहल और उसके डर  के दबाव में जी रहे थे । कई देशों में भुखमरी की स्थिति थी । एनी बेसेंट जैसे कुछ लोग धरती पर युद्ध बन्ध हो और शांति बनी रहे  उसके के लिए कोशिश कर रहे थे ।  डा. एनी बेसेंट और प्रीस्ट लीड बिट्टर ने थियोसोफिकल सोसाइटी के कुछ सदस्यों के साथ मिलकर सोचा कि यदि कोई बुद्ध या क्राइस्ट जैसा  आत्मा जगत गुरु बन के  जन्म ले, केवल तभी यह युद्ध बंध हो सकता है । और तो ही , इस पृथ्वी का अस्तित्व संभव है । अन्यथा यह पृथ्वी का विनाश नक्की है ।  तब उनको याद आया कि बुद्ध ने उनकी अन्तिम विदाय के समय कहा था कि वह इस पृथ्वी पर एक  बार फिर से, जन्म लेन्गे और तभी , उनका नाम मैत्रेय रहेगा  । मतलब मित्र होगा । एनी बसेंट ने और लीड-बीटर  ने सोचा कि,  यदि वे एक बहुत शुद्ध पवित्र शरीर की व्यवस्था कर सकें , तो  उसका शरीर बुद्ध की आत्मा के लिए वाहन बन सकता है ।  तब  बुद्ध का पुनर्जन्म शक्य हो सकता  हैं । तो उस शुद्ध पवित्र शरीर में   बुद्ध का स्वयं या उनकी आत्मा या उनकी चेतना का  प्रवेश हो सकता हैं । 
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 इसलिए इस आशा मे एनी बसेंट ने दुनिया भर में से, कुछ 15 लड़कों, जिनकी चेतना पवित्र है, उन  को एकत्रित किया ।  जिन्हें कि वे एक वाहन या एक शुद्ध शरीर के रूप में बुद्ध का अवतरण या उनके के आगमन के लिए उपयोग कर सकें ।
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ठीक उसी समय, एनीबसेंट और उसकी मंडली अपनी यात्रा के दौरान वे अदियार पहुंचे । जब वे अदियार में  नदी के किनारे से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि कुछ पांच-दस लड़के नदी में नहा रहे थे ।  वो  पांच दस लड़के उनमें से एक लड़का के उपर पानी, कीचड़ और रेत फ़ेंक रहे थे, और वह लड़का कोई भी  प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था । वह बिना तादात्म्य के सिर्फ उनको देख रहा था । वे वहां रुक गए । प्रीस्ट लीड बेटर न उसे लड़के के प्रभामंडल, आहुरा  को पहचाना. उन्होंने पाया की वह बहुत अदभुत बालक है... और यह प्रतिक्रिया न देना वास्तव में एक बुद्ध पुरुष का लक्षण है  । वे तुरंत नदी पर पहुंचे और पाया कि वह बालक कृष्णमूर्ति था ।
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 बालक कृष्णमुर्ती  अपने नजीक रहे , और उनके उपर काम हो सके , इसलिये , डा. एनी बेसेंट ने कृष्णमुर्ती के पिता  नरिअनिअहिन को थियोसोफिकल सोसाइटी के ऑफिस में क्लार्क का काम दे दिया । उनको थियोशोफीकल सोसाइटी में ऑफिस असिस्टेंट की नौकरी दे दि  गयी और वे ऑफिस के नजीक वाला गाव  अदियार पास ही में स्थानांतरित हो गए ।  क्रिश्ना  और उनका छोटा भाई, नित्या दोनों ने , अदियार में सुब्रमनियन स्कूल में दाखिला ले लिया .
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डॉक्टर अनिबेसंट ने और थियोसोफिकल सोसाइटी ने उनके पिताजी की लिखित आज्ञा से क्रिश्ना की जिम्मेदारी ले ली । कृष्णमूर्ति का भाई नित्या भी उनके साथ सम्मिलित हो गया । डा. एनी बेसेंट ने दोनों भाइयों को लंदन भेज दिया । उन्होंने उन बच्चों को उच्च विश्व स्तर का शिक्षण मिले और विश्व  स्तर का अनुशासन और उठने बैठने का तोर तरीका शिखने को  मिले , इसीलिए पुरे   विश्व भर के  अच्छे शिक्षक इक्कठे कर लिया ।  और  उन बच्चो के लिए वहां पर, कई शिक्षक नियुक्त कर दिये गये ।
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एक तिबतियन मास्टर के नेत्रित्व में, एनी बसेंट ने उन बच्चो को  ध्यान शिखाने की व्यवस्था की । बहुत समय करीब 10 12 साल  के अभ्यास और प्रयत्न  के बाद कृष्णमुर्ती का शरीर , बुद्ध के प्रवेश के लिए, एक शुद्ध शरीर या माध्यम बनने के लिए तैयार बन गए । कृष्णमुर्ती के शरीर में बुद्ध कि आत्मा प्रवेशे ,इस  के लिए उन्होंने एक दिन निश्चित किया ।
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 प्रेसिडेंट एनी बसेंट ने उस समारोह में भाग लेने के लिए थियोसोफिकल सोसाइटी के सभी सदस्यों को आमंत्रित किया । जहाँ भगवान बुद्ध, कृष्णमूर्ति के शुध्ध पवित्र शरीर में प्रवेश करने वाले थे । जब भगवान बुद्ध का आत्मा , क्रिश्नामुर्ती के शरीर में प्रवेश  हो जाये, तब वे कृष्णमूर्ति को उनके नए नाम मैत्रेय से एक विश्व शिक्षक , जगत गुरु  के रूप में घोषणा करने वाले थे ।
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पूरा समारोह थियोसोफिकल सदस्यों से भरा हुआ था,पुरी दुनिया से  थोसोफिकल सोसाइटी के सभी सदस्य वहां आये हुए थे, और थियोसोफिकल सोसाइटी की चेयरमैन डा. एनी बेसेंट लोगों को संबोधित करने वाली थीं ।  और कृष्णमूर्ति को भगवान मैत्रेय के रूप में परिचय देने वाली थीं । 
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लेकिन, बराबर, ठीक समय पर , जब बुद्ध कि आत्मा , कृष्णमुर्ती के शरीर मे प्रवेश करने वाली थी,  उसी समय, . कृष्णमुर्ती ने घोषणा की कि मैं स्वयं एक बुद्ध हूं । ( हो गया  हूँ ।) और मुजे मे, मेरे शरीर में और कोई बुद्ध कि आत्मा का प्रवेश कराने की  जरुरत नही है ।
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उन्हों ने कहा,  मैं स्वतंत्र हूँ । मैंने जो सत्य जाना है वह असीम है । मेरा कोई शुरुआत या अंत नहीं है । मैं सिर्फ प्रेम हूँ । और उस प्रेम को मे सभी दुनिया की चीजों से ऊपर रखता हूँ ।  मेरा नैतिकता से, समाज से, किसी धर्म से या किसी रीति-रिवाज से कोई सम्बन्ध नहीं है ।  मेरा सम्बन्ध केवल जीवन से है । मेरे लिए जीवन ही भगवान है ।  लेकिन मैं भगवान शब्द का प्रयोग नहीं करूंगा ।  किसी दूसरे व्यक्ति या किसी बुद्ध को मेरे इस शरीर में प्रवेश करने की अभी आवश्यकता नहीं है ।  मैं स्वयं एक बुद्ध हूँ , मास्टर हूँ ।   कृष्णमूर्ति ने  घोषणा की, “कि मैं किसी व्यक्ति ,समूह, मत या स्वयं का अनुसरण नहीं करता हूँ.” मेरा कोई शिष्य नहीं है और न ही मैं किसि का  गुरु हूँ , मेरी कोई चाह नहीं है । 
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और  मै आप को बता देना चाहता हूँ की , कोई मास्टर या गुरु आपको सत्य तक नहीं ले जा सकता । सत्य की खोज के लिए आपको बिना किसी मध्यस्थ के,बिना किसी गुरु के  सीधे ही स्वयं को सत्य का शिष्य बनना पड़ेगा ।  सत्य कभी कोई आशा नहीं देता, यह केवल समझ देता है ।  किसी व्यक्तित्व की पूजा करके, कोई भी व्यक्ती समझ विकसित नहीं कर सकता है । यह सब अनावश्यक है... किसी का सहारा से अध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता है ।  सत्य, मन , बुद्धी और हृदय की सीमाओं से परे है । सत्य आपके भीतर है । विकास के किसी भी क्रम में, सभी व्यक्ति को मुक्ति मिल सकती है ।  मैं आप सब के किये उपासना रूपी कोई पिंजरा नहीं बनाने जा रहा हूँ ।
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 क्या आप सत्य जानना चाहते हैं....? लेकिन मुझे मालूम है कि आप सत्य को नहीं जानना चाहते हैं, लेकिन आपकी रूचि सत्य में नहीं,  बल्कि आप की रूचि सत्य के सबंध में जानने ने में है , या सत्य को बताने वाले गुरु में रूचि है, जो कि शब्दों को तोड़-मरोड़कर पेश करता है ।
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आप मुझसे पूछते हैं, की मै कौन हूं...?  "मेरा उत्तर है कि, मैं सब कुछ हूँ,मै बुद्ध हूँ ,  मैं जीवन हूँ.” 
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उसके बाद , काफी थिओसोफ़िकल सोसायटी के मेम्बेर्स ने कृष्णमुर्ती को प्रबुद्ध मान ने से इन्कार कर दिया , डॉक्टर अनिबेसंट का भी अपमान हुंआ ।  लेकीन उन्होने कहा , जो भी हो, कृष्णमुर्ती प्रबुद्ध है , और वो जगत् गुरु है ।
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 तब से पुरे विश्व मे उन्होने प्रवचन देना  शुरू कर दिया । दुसरे महा युद्ध के समय , युरोपिअन समाज ने उनको प्रवचन देने  के उपर दो साल के लिये प्रतिबंध कर दिया था  । उन्होंने 1929 से लेके 1990 तक ध्यान और ध्यान के संबंधित प्रवचन पूरी दुनिया में घुम घुम कर दिया   । करीब करीब 60 साल लोगो को जगाया । उनका शरीर बहुत नाजूक था , उन को थंडी मे तकलीफ होती थी, इसलिये वे जनवरी और फरवरी मे , भारत मे प्रवचन देने  के लिये आते थे ।
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मे तो तभी कोलेज मे इंटर सायन्स मे पढता था , और ओशो को पढता था और सुंनता था, जब ओशो ने बताया कि कृष्णमुर्ती भी प्रबुद्ध व्यक्ती है, उनका भी दिया भी  जला हुआ है, तब से काफी ओशो सन्यासी भी उनको सून ने के लिये आने  लगे ।    मुंबई मे , जे जे कोलेज ऑफ आर्टस् के काम्पौंड मे श्याम को ६ बजे , प्रवचन देते थे ।  हम ख़ुशी ख़ुशी जल्दी पहुंच जाते थे, ताकी, उनके नजीक बैठ ने का मौका मिले ।  वह बहुत नाजूक और सुंदर थे. आज भी याद है ।
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लास्ट दो साल से उनकी तबियत में तकलीफ था, वे जल्दी थक जाते थे । लास्ट 1985 नवेम्बर में , वे भारत  आये थे ।  और उन्होंने अपने ऊपर बने प्रतिष्ठान –क्रिश्नमुर्थी फाऊनडेसन - को विसर्जीत करनेकी की बहोत प्रयत्न कर रहे थे, लेकिन उनके अलावा कोई भी वह संस्था का विसर्जन करने में उत्सुक नहीं थे, जीस मे कृष्णमुर्ती के फोलोवर  अपने को सुरक्षित महसूस करनेके आदी हो गए थे ।  सब प्रबुद्ध पुरुष के साथ ऐसा ही होता है । वे चाहते है, की उनकी शिक्षा एक सम्प्रदाय बनके ना रह जाए...।
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ओशो ने भी, जब अमेरिकन सरकार ने पकड़ लिया , उसके पहेले के प्रवचन में , बताया था , की अब मेरी माला और मरूंन कपड़ा निकाल दो , मेरा सन्यासिन मेंरी  माला और मरून्न कपडे से नहीं, बल्की ध्यान से पहेचाना जाना चाहिए ।  मेरे फोटो मेरे आश्रम से हटा दो । लेकिन बाद में कौन अनुआयी मानता है । अनुआइ तो आखिर अनुआइ हि होता है ।
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 नवंबर 1985 में कृष्णमूर्ती जब रिशीवेली पहुंचे तभी वह बहुत ही थके हुवे थे । उनका वजन कम होता जा रहा था । और बुखार बढाता जाता था  । कभी कभी प्रवचन के दोरान उनको १०४ डीग्री , बुखार बना रहेता था ।  फाउन्डेसन विसर्जन करनेकी लड़ाई में हार ने   के बाद , वे बहुत मायुश और असहाय अपने को पाते थे । उनके शब्द में अगर कहे , तो ...
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” जब क्रिश्नमुर्थी मरेगा ( वे हमेशा अपने को थर्ड व्यक्ती में बता थे ) जो की अपरीहार्य है, आप अपने मन में यम-नियम बनाने में लग जाओगे, क्योंकी यह व्यक्ती,  क्रिश्नमुर्थी ने सत्य को आपके सामने प्रस्तुत किया है, अतह आप ये कृष्णमूर्ति  का मंदीर बनायेंगे, फिर आप कृष्णमूर्ति का धर्मानुस्थान बनाएंगे...फिर आप कृष्णमूर्ति ऊपर बड़े प्रतिष्ठान बनाएंगे ,   और फिर आप उसके ऊपर एक  इमारत बनाएंगे, उसको मंदिर नाम देंगे, फिर आप  उसमे  फस जायेंगे । और फिर इस मंदीर में से आप को निकालने के लिए , एक और गुरु की आवश्यकता होगी  , जो आपको इस इमारत से बहार निकाले ।
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 और आप फिर वही गुरु या शिक्षक के आस पास और , एक मंदीर बनाएंगे, बस वैसे सिलसिला चलता ही रहेगा...”
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वे इस बात से चिंतित थे की उनके जाने के बाद , फिर कोई उनका एक उत्तराधिकारी बन जाएगा, इसीलिए उन्होंने अंत में कहा की...”किशी भी परिस्थिती में , कोई भी व्यक्ति या संस्था या इसका कोई भी सदस्य अपने को क्रिश्नमुर्थी की शिक्षा  का विशेश्ग्य  कह कर स्थापित नहीं करेगा ।
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कृष्णमूर्ति का देहांत 17  फरवरी 1986 में अमेरिका में ओझाई में हुआ। डॉक्टर ने पेंक्रियास का कैंसर बताया था । एक दिन पहेले ही उन्होंने बता दिया था , की वह कल शरीर का त्याग कर देंगे ।  और अपने लोगो को बताया था,  की उनकी बोडी ,या शरीर  को बहुत साधारण आदमी की तरह  विद्युत फरनेस में जला देना ।
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उन्होने ” भारत में अंतिम प्रवचन , जनवरी 1985  में दिया , लेकीन वे ज्यादा बोल नहीं सके, उनको काफी बुखार था, फिर उन्होंने कहा , ठीक है , हम थोड़ी देर चुप-चाप ध्यान में बैठेंगे.”...दूसरे दिन सुबह में उनका तबियत थोड़ा ठीक था , वे एक टेनिसन की कविता गुनगुना रहे थे । उसी रात वे ओजय, अमेरिका  चले गए । हवाई अड्डे पे विदाय लेते वक्त , उन्होंने जो अंतिम  वाकय  बोले वह यह  था, की...” सर , अब सर्कस खत्म हो गया, अब में वापस नहीं आउंगा...”
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लगभग एक महीने बाद , 17 फरवरी 1986 में ओजय में उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया...मृत्यु के एक दिन पहेले , उन्होंने अपने साथी लोगो को अनुरोध किया था, की उनके पीछे , कोई भी कर्म-क्रिया कांड ना किया जाए । और उनका शरीर को विद्युत सब गृह मे भेजा जाये ।
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